Shant Ras : शांत रस की परिभाषा, उदाहरण व स्थाई भाव सहित | Shant Ras Kise Kahate Hain

स्वागत है दोस्तों आज की नई पोस्ट शांत रस (Shant Ras) में आज इस पोस्ट के माध्यम से जानने की कोशिश करेंगे की शांत रस किसे कहते हैं (Shant Ras Kise Kahate Hain) तथा सा ही शांत रस के कुछ महत्वपूर्ण उदाहरण के माध्यम से इस पोस्ट को पढ़ेंगे। 

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Shant Ras Paribhasha Udaharan Sthayi Bhav

रस किसे कहते हैं | Ras Kise Kahate Hain

काव्यकथानाटकउपन्यास आदि के पढ़ने, सुनने या उसका अभिनय देखने से जो आनंद की प्राप्त होती है उसे रस कहते हैं।

शांत रस की परिभाषा | Shant Ras Ki Paribhasha

अनित्य और असार तथा परमात्मा के वास्तविक रूप के ज्ञान से हृदय को शांति मिलती है और विषयों से वैराग्य हो जाता है। यही अभिव्यक्त होकर शांत रस में परिणत हो जाता है, दूसरे शब्दों में निर्वेद परिपक्वास्था को शांत रस कहते हैं। इसका स्थायी भाव निर्वेद होता है।

दूसरे शब्दों में – जब मनुष्य मोह माया को त्याग कर संसारिक कार्यों से मुक्त हो जाता है और वैराग्य धारण कर परमात्मा के वास्तविक रूप का ज्ञान होता है, तो मनुष्य के मन को जो शांति प्राप्त होती है उसे शांति रस कहते हैं।

शांत रस के भाव | Shant Ras Ke Bhav

रस शांत रस
स्थाई भावनिर्वेद, वैराग्य, उदासीनता
विभावचिंता
संचारी भावशांति, हर्ष, स्मृति
अनुभवशांति, रोमांच, पवित्रता

शांत रस के उदाहरण | Shant Ras Ke Udaharan

जब मैं था तब हरि नहीं, जब हरी है मैं नहीं।
सब अंधियारा मिट गया, जब दीपक देख्या मांहि।।
बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर?।
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर।।
मेरो मन अनत कहां सुख पावै।
जैसे उड़ि जहाज को पंछी पुनि जहाज यै आवै।
सूरदास प्रभु कामधेनु तजि, छेरि कौन दुहावै।
मन पछितैहैं अवसर बीते।
माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोहे।
एख दिन ऐसा आएगा, मैं रौदूंगी तोहे।।
कबहुंक हौं यहि रहनि रहौंगो।
माला फेरत जुग भया, गया न मनका फेर।
कर का मनका डारि कै, मन का मनका फेर।।
रे मन ये दो दिन का मेला रहेगा
कायम ना जग का झमेला रहेगा।
रहना नहिं देस बिराना है।
यह संसार कागद की पुड़िया, बूंद पड़े गली जाना है।
मन पछितैहैं अवसर बीते।
दुर्लभ देह पाइ हरिपद भजु, करम बचन अरु हीते।।
कबहुंक हौं यहि रहनि रहौंगो।
श्री रघुनाथ कृपालु कृपा तैं, संत सुभाव गहौंगो।
राम राम की लूट हैं लूट सके तो लूट।
अंत काल पछताएगा जब प्राण जायेगे छूट।।
ऐ मालिक तेरे बंदे हम, ऐसे हो हमारे कर्म
नेकी पर चले बंदी से टले।
मन पछतहिह अवसर बीते।
दुर्लभ देहि पाई हरि पद। भजु करम असहिते।।
“चलती चाकी देखकर दिया कबीरा रोय
दुयै पातन के बीच में साबुत बचा न कोय।”
मन मस्त हुआ फिर क्यों डोले?
हीरा पायो गांठ गठियायों, बार-बार बाको क्यों खोलें।
अब लौं नसानी, अब न नसैहौं।
राम-कृपा भव-निंसा सिरानी, जागे फिरि न डसैहों।।
पायेउ नाम चारु चिंतामनि, उर कर ते न खसैहों।
स्यामरुप सुचि रुचिर कसौटी, चित कंचनहिं कसैहों।।
मन रे! परस हरि के चरण सुलभ,
शीतल कमल कोमल, त्रिविधा ज्वाला हरण
देखी मैंने आज जरा
हो जावेगी क्या ऐसी मेरी ही यशोधरा
हाय! मिलेगा मिट्टी में वह वर्ण सुवर्ण खरा
सुख जावेगा मेरा उपवन जो है आज हरा

 

निष्कर्ष

छात्रों मैं उम्मीद करता हूं कि आपको आज की यह पोस्ट शांत रस किसे कहते हैं (Shant Ras Kise Kehte Hain) आपको पसंद आई होगी मैं इस पोस्ट को शांत रस को कुछ उदाहरण (Shant Ras Ke Udaharan) के माध्यम से समझने की संपूर्ण कोशिश की है जिससे आपको शांत रस आसानी से समझ में आ जाए।

यदि आपको शांत रस या इस पोस्ट से किसी प्रकार का कोई शिकायत है या आपको शांत रस (Shant Ras) से संबंधित कोई सुझाव देना है तो आप हमें कमेंट सेक्शन या फिर ईमेल के माध्यम से सूचित कर सकते हैं मैं आपके इस सवाल का जवाब जल्द से जल्द देने का प्रयास करूंगा आपके बहुमूल्य विचारों का इंतजार रहेगा।

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