समास – समास किसे कहते हैं? परिभाषा, भेद व उदाहरण | Samas in Hindi

समास – समास किसे कहते हैं? परिभाषा, भेद व उदाहरण | Samas in Hindi

Samas in Hindi

दो अथवा दो से अधिक शब्दों के योग से जब एक नया शब्द बन जाता है तब उसे सामासिक शब्द और उन शब्दों के योग को समास कहते हैं।

जैसे कार्य कुशल शब्द कार्य और कुशल दो शब्दों के योग से बना है।

इसका अर्थ है कार्य में कुशल इन दोनों शब्दों को जोड़ने वाला ‘में’ शब्द है। इन का समास होने पर उसका लोप हो गया।

समास विग्रह किसे कहते हैं

समस्त पद में लुप्त विभक्ति योजक चिन्ह अव्यय पदों को पुनः लिख देना समास विग्रह कहलाता है।

जैसे – विद्यालय – विद्या के लिए आलय

समास से संबंधित कुछ मुख्य नियम ।

  1. समास में कम से कम 2 शब्दों या पदों का योग होता है।
  2. ऐस मेल वाले दो अथवा अधिक पद मिलकर एक हो जाते हैं।
  3. मिलने वाले पदों के विभक्त प्रत्यय का लोप हो जाता है।

संधि और समास में अंतर

संधि और समास में कुछ मुख्य निम्नलिखित अंतर पाए जाते हैं जो इस प्रकार से हैं।

  1. संधि में दो वर्णों का योग होता है, किंतु समाज में 2 पदों का योग होता है।
  2. संधि में दो वर्णों के मेल और विकार की संभावना रहती है दूसरी ओर समास में पदों के प्रत्यय का लॉक हो जाता है।

समास किसे कहते हैं? (samas kise kahate hain)

समास की परिभाषा – जब दो शब्दों के बीच विभक्त का लोप कर जो छोटा रूप बनता है उसे समास कहते हैं।

{दो पदों के मध्य प्रयुक्त विभक्ति योजक या अव्यय पदों को हटाकर उन्हें पास – पास लिख देना। समास कहलाता है।}

समास का अर्थ – संक्षिप्त कर देना या छोटा रूप                                समास का शाब्दिक अर्थ – सम+आस

सम का अर्थ है – पास, तथा आस का अर्थ है – बैठना।

समास के कितने भेद होते हैं। व प्रकार (samas ke kitne bhed hote hain)

समास के भेद – समास के मुख्य छ भेद होते हैं तथा समास के 15 उपभेद भी होते हैं जो मुख्यतः इस प्रकार से हैं।

  1. अव्ययीभाव समास
  2. कर्मधारय समास
  3. तत्पुरुष समास
  4.  द्वंद समास।
  5. बहुव्रीहि समास।
  6. द्विगु समास

नोट – पदों की प्रधानता के आधार पर समास के भेद – पदों की प्रधानता के आधार पर समाज के निम्नलिखित चार भेद होते हैं।

  1. प्रथम पद प्रधान समाज {अव्ययीभाव समास}
  2. दूसरा पद प्रधान समास {तत्पुरुष समास}
  3. उभयपद प्रधान समाज {द्वन्द समास}
  4. उभयपद अप्रधान समाज {बहुव्रीहि समास}

अव्ययीभाव समास (avyayibhav samas )

जिस समास का पहला पद प्रधान होता है अर्थात जिस समस्त पद में प्रथम पद अव्यय, उपसर्ग व प्रधान हो तथा बाद वाला पद संज्ञा हो अव्ययीभाव समास होता है।  प्रथम पद – अव्यय, उपसर्ग

अव्यय – जो शब्द काल, लिंग, वचन तथा कारक के अनुसार परिवर्तन नहीं होते हैं उसे अव्यय कहते हैं।

अव्ययीभाव समास के उदाहरण (avyayibhav samas ke udaharan)

यथाक्रम – क्रम के अनुसार
यथाशीघ्र – जितना शीघ्र हो
प्रतिदिन – दिन दिन या प्रत्येक दिन
प्रतिक्षण – प्रत्येक क्षण
यथा विधि – विधि के अनुसार
यथेच्छा – इच्छा के अनुसार
प्रत्यक्ष – अक्षि के आगे
प्रत्येक – हर एक दिन
सपरिवार – परिवार के साथ

प्रत्युपकार – बदले के उपकार
प्रतिपल – प्रत्येक पल
यथावसर – अवसर के अनुसार
प्रतिक्षण – हर क्षण
यथाशक्ति – शक्ति के अनुसार
यथास्थान – जो स्थान निश्चित है
यथामति – जैसी मति है
यथार्थ – जैसा अर्थ है वैसा
यथोचित – जैसा उचित है
प्रतिध्वनी – ध्वनि के बाद ध्वनि
प्रतिशत – प्रत्येक सत या सैंकड़ा
प्रतिहिंसा – हिंसा के बदले हिंसा
प्रतिद्वंद – द्वन्द के बदले द्वन्द

नोट – जिस समास का पहला पद “यथा” और “प्रति” से शुरू होता है उसे सदैव अव्ययीभाव समास कहते हैं।

एक शब्द दो बार आए और वह शब्द अव्यय की तरह कार्य करें अव्ययी भाव समास कहते हैं।

 अव्ययपद पूर्व अव्ययीभाव समास के उदाहरण

साफ-साफ :- साफ के बाद साफ     घर-घर :- प्रत्येक घर                  हाथों-हाथ :- एक हाथ से दूसरे हाथ तक                                                बीचो-बीच :- ठीक बीच में

कानो-कान :- कान ही कान में

सुना-सुनी :- सुनने के बाद सुनना
घड़ी-घड़ी :- हर घड़ी
एका-एक :- एक के बाद एक
धड़ा-धड़ :- धड़ के बाद पुनः धड़
रातो-रात :- रात ही रात में
एक-एक :- एक के बाद एक
भागम-भाग :- भागने के बाद भागना

नाम पद पूर्व अव्ययीभाव समास

जिस शब्द के पहले उपसर्ग लगा रहता है उसमें अव्ययीभाव समास होता है और वह शब्द अव्यय की तरह कार्य करता है।

उदाहरण – पेट-भर :- पेट भर कर
आमरण – मरने तक
बकायदा – कायदे के अनुसार
लाजवाब –  बिना जवाब के
निरोग – रोग रहित
नासमझ – बिना समझ के
बेईमान – बिना ईमान के
बेचैन – बिना चैन के
सार्थक – अर्थ सहित
निडर – बिना डर के
निधड़क – बिना धड़क के
निर्विकार -बिना विकार के

द्वंद समास (Dwand Samas)

अभय पद {दोनों पद} प्रधान जिस समस्त पद में दोनों पद प्रधान हो तथा एक दूसरे के विलोम या विलोम जैसे हो वहां द्वन्द समास होता है।

  • द्वंद समास शब्द का अर्थ है। – जोड़ा
  • जिस समास में दोनों पद प्रधान होते हैं उसे द्वन्द समास कहते हैं इस समास का विग्रह करने पर “{और, या}” का प्रयोग होता है।

नोट – 1 से लेकर 9 तक एवं सभी पूर्ण संख्याओं को छोड़कर अपूर्ण संख्याओं में द्वंद समास होता है।

Ex.  पैंतालीस – चालीस और पांच

तिरानवें – नब्बे और तीन
पच्चीस – बीस और पांच
छियासी – अस्सी और छह

द्वंद समास के उदाहरण (Dwand Samas ke udaharan)

माता-पिता :- माता और पिता
धर्मा-धर्म :- धर्म और अधर्म
दाल-रोटी :- दाल और रोटी
अन्न-जल :- अन्न और जल
शीतोष्ण :- शीत या उष्ण
भला-बुरा :- भला और बुरा
दूध-रोटी :- दूध और रोटी
लाभ-हानि :- लाभ और हानि
स्त्री-पुरुष :- स्त्री और पुरुष
भाई-बहन :- भाई और बहन

गौरी-शंकर :- गौरी और शंकर
जल-वायु :- जल और वायु हरि-हर :- हरि और हर  पान-तमाखू :- पान और तमाखू
हाथी-घोड़ा :- हाथी और घोड़ा
कपड़े-लत्ते :- कपड़े और लत्ते
सीता-राम :- सीता और राम
राजा-प्रजा :- राजा और प्रजा
खरा:-खोटा खरा और खोटा
नर-नारी :- नर और नारी फल-फूल :- फल और फूल रुपया-पैसा :- रुपया और पैसा
दाल-भात :- दाल और भात
शुभा-शुभ :- शुभ और अशुभ

नोट– यदि पदों की संख्या 3 हो तो समास विग्रह किस प्रकार करेंगे।

उदाहरण – लाल-पाल-बाल :- लाल,पाल और बाल

रोटी-कपड़ा-मकान :- रोटी,कपड़ा और मकान
तन-मन-धन :- तन,मन और धन
हाथी-घोड़ा-पालकी :- हाथी,घोड़ा और पालकी

नोटवैकल्पिक द्वंद – द्वंद के इस उपभेद में पद एक दूसरे के विलोमर्थी होते हैं। इसके उदाहरणों का समास विग्रह करते समय पदों के बीच “या / अथवा” लिख देते हैं।

उदाहरण– सुख-दुःख :- सुख या दुख
भला-बुरा :- भला या बुरा,
पाप-पुण्य :- पाप या पुण्य
सत्यासत्य :- सत्य या असत्य
राग-विराग :- राग या विराग
आज-कल :- आज या कल
सुख-दुख :- सुख या दुख

संख्यावाचक वैकल्पिक द्वंद – अनिश्चित संख्यावाचक विशेषण भी कभी-कभी संज्ञा के समान प्रयुक्त होते हैं तब भी वैकल्पिक द्वंद माना जाता है।

उदाहरण– दो – चार  :-  दो से चार तक
दस – बीस। :-  दस से बीस तक
सौ – दो सौ     :- सौ से दो सौ तक
लाख – दो लाख   :-  लाख से दो लाख तक

द्विगु समास  (Dvigu samas kise kahate hain)

जिस समाज का पहला पद संख्यावाचक हो और वह संपूर्ण समुदाय या समूह का बोध करता हो उसे द्विगु समास कहते हैं इस समास का विग्रह करने पर समूह या समाहार का प्रयोग करते हैं।

दिगु समास के उदाहरण (dvigu samas ke udaharan)

नवरात्र – नौं यात्रियों का समाहार   सप्ताह – सात दिनों का समाहार
सप्तऋषि – सात राशियों का समूह
शताब्दी – सौ वर्षों का समूह   शतक – सौ का समाहार
पंचवटी  – पांच वटों का समाहार।
चौमासा – चार मासों का समाहार
त्रिरत्न – तीन रत्नों का समाहार।
अठन्नी – आठ आनो का समूह
द्विगु – दो गायों का समूह।  त्रिवेणी – तीन वेणियों का समाहार। दुपहिया – दो पहियों वाला
त्रिमूर्ति – तीन मूर्तियों का समूह। तिकोना – तीन कोनों वाला
पंचपात्र – पांच पात्रों का समूह।
चौराहा – चार राहों का समूह। दोपहर – दो पहरों का समूह।
सतसई – सात सौ दोहों का समूह। तिरंगा – तीन रंगों का समूह।  त्रिभुवन – तीन भवनों का समूह।
चतुर्भुज – चार भुजाओं का समूह

नोट– तिरंगा तथा चतुर्भुज में द्विगु और बहुव्रीहि दोनों समास है।

कर्मधारय समास (karmadharaya samas ki paribhasha)

जिस समाज का एक पद  {प्रथम पद} विशेषण हो दूसरा पद विशेष्य (संज्ञा) हो उसे कर्मधारय समास कहते हैं इस समास का विग्रह करने पर ‘है जो’ का प्रयोग करते हैं।

कर्मधारय समास के उदाहरण (karmadharaya samas ke udaharan)
नीला आकाश :- नीला है जो आकाश
नीलगाय :- नीली है जो गाय
महात्मा :- महान है जो आत्मा
महाऋषि :- महान है जो ऋषि
मंदबुद्धि :- मंद है जो बुद्धि
घनश्याम :- घन जैसा श्याम
पितांबर :-  पीत है जो अंबर
भक्तांबर :- रक्त के रंग का है जो अंबर
निलोत्पल :- नीला है जो उत्पल
परमाणु :- परम है जो आणु
महाराजा :- महान है जो राजा

महादेवी :- महान है जो देवी
महाभोज :- महान है जो भोज
श्वेतांबर :-  श्वेत है जो अंबर
महाकाव्य :- महान है जो काव्य
प्रियजन :- प्रिय है जो जन
सूपुरुष :- अच्छा है जो पुरुष
नीलरत्न :- नीला है जो रत्न
नीलकमल :- नीला है जो कमल
उच्च शिखर :- ऊंचा है जो शिखर
महाजन :- महान है ज
काली मिर्च :- काली है जो मिर्च

जहां उपमेय तथा उपमान में संबंध होता है उसमें कर्मधारय समास होता है। इसका विग्रह करने पर ‘रूपी’ का प्रयोग होता है।

उदाहरण – मुख-चंद्र :- मुख रूपी चंद्रमा
भवसागर :- भव रूपी सागर
क्रोधाग्नि :- क्रोध रूपी अग्नि
चरण कमल :- चरण रूपी कमल
देहलता :- लता रुपी देह
करकमल :- कमल रूपी कर
कीर्तिकला :- लता रूपी की कीर्ति
नोट– जब प्रथम पद उपमान हो तथा उत्तर (बाद वाला पद) उपमेय हो तो इसका विग्रह करने पर के समान का प्रयोग करेंगे।

चंद्र-बदन :- चंद के समान वदन
कमलनयन :- कमल के समान नयन
लौहपुरुष :- लोहे के समान पुरुष
अरविंदलोचन :- अरविंद के समान लोचन
विद्याधन :- विद्या रूपी धन
मीनाक्षी :- मछली के समान आंखों वाली
कनकलता :- कनक के समान लता
मुखारविंद :- मुख के समान अरविंद

बहुव्रीहि समास (bahuvrihi samas ki paribhasha)

जिस समास का ना तो प्रथम पद प्रधान होता है और ना ही द्वितीय पद प्रधान होता है कोई अन्य अर्थ निकलता है उसे बहुव्रीहि समास कहते हैं। इस समास का विग्रह करने पर वाला ‘है जो’ जिसका, जिसकी, जिसके वह आदि शब्दों का प्रयोग करते हैं।

बहुव्रीहि समास के उदाहरण (bahuvrihi samas ke udaharan)

त्रिनेत्र :- तीन है नेत्र जिसके (शिव)
मुरारि :- मुर का अरि है जो वह (कृष्णा)
गिरिधर :- गिरी को धारण करने वाला (कृष्णा)
दशानन :- दस है आनंद जिसके (रावण)
गजानन :- गज का आनंद है जिसका (गणेश)
दिगंबर :- दिशाएं ही है जिसका अंबर ऐसा वह
घनश्याम :- घन जैसा श्याम है जो वह (कृष्णा)
पितांबर :- पीत अम्बर है जिसके वह (विष्णु)
पंजाब :- पांच आबों वाला क्षेत्र एक राज्य
बारहसिंघा :- बारह है सींग जिसके (हिरण की प्रजाति)

अंशुमाली :- अंशुओं के माला पहनता है जो (सूर्य)
प्रधानमंत्री :- मंत्रियों में प्रधान है जो (शासनाध्यक्ष)
युधिष्ठिर :- युद्ध में स्थित रहता है जो (धर्मराज)
धनंजय :- धन को जय करता है जो (अर्जुन)
सुग्रीव :- सुंदर है ग्रीवा जिसकी मानव राज
मुरारी सुंदर :- है जो रि है जो श्याम श्री कृष्ण
चंद्रमुखी :- चंद्र है मोली पर जिसके (शिव)
पंचानन :- पांच है आनंद जिसके शिव
लंबोदर  :- लंबा है जिसका गणेश
त्रिलोकी :- तीन लोक का स्वामी है जो
शाखामृग :- जो पेड़ की शाखाओं पर चलता है
मृत्युंजय :- जिसने  मृत्यु को जीत लिया है जो
हंस वाहिनी :- हंस जिसका है वाहन

नोट- घनश्याम और पिताम्बर कर्मधारय तथा बहुव्रीहि समास होता है।

तत्पुरुष समास (tatpurush samas ki paribhasha)

जिस समस्त पद में उत्तर पद प्रधान हो तथा दोनों पदों के मध्य कारक विभक्त का लोक रहे वहां तत्पुरुष समास होता है। पदों की प्रधानता के आधार पर यह द्वितीय पद प्रधान समास होता है क्योंकि तत्पुरुष समास की विभक्ति का लिंग वचन द्वितीय शब्द के कारण परिवर्तन होता है।

जैसे– जेबकतरा :- जेब को कतरने वाला।

तत्पुरुष समास के कितने प्रकार होते हैं (tatpurush samas ke bhed)

तत्पुरुष समास के निम्नलिखित 6 प्रकार होते हैं

तत्पुरुष समास। –              विभक्ति
कर्म तत्पुरुष समास। –           को
करण तत्पुरुष समास। –           से, के द्वारा
संप्रदान तत्पुरुष समास –           से, के लिए
अपादान तत्पुरुष समास –         से, अलग होना
संबंध तत्पुरुष समास –             का, के, की
अधिकरण तत्पुरुष समास –       में, पर, पे

कर्म तत्पुरुष समास (karm tatpurush samas) – इस समाज में दोनों पदों के बीच  ‘को’ विभक्ति का लोप रहता है।

उदाहरण- वन गमन :- वन को गमन करने वाला
चिडिमार – चिड़ी को मारने वाला
कमरतोड़ :- कमर को तोड़ने वाला।
दिल तोड़ :- दिल को तोड़ने वाला।
प्राप्तोदक :- उदक को प्राप्त।
आग्नि भक्षी :- अग्नि को भक्षित करने वाला
मनोहर :- मन को हरने वाला।
चितचोर :- चित को चुराने वाला।
स्वर्ग :- प्राप्त स्वर्ग को प्राप्त करने वाला।
विदेश :- गमन विदेश को गमन।

नरभक्षी :- नरो को भक्षित करने वाला।
यश प्राप्त :- यश को प्राप्त।
ग्रहगत :- घर को आया हुआ।
कृष्णाश्रित :- कृष्ण को आश्रित।

करण तत्पुरुष समास – यह समास में दोनों पदों के बीच (से) या (के द्वारा) विभक्त का लोप रहता है तो तत्पुरुष समास होगा।
उदाहरण– तुलसीकृत – तुलसी के द्वारा रचित
हस्तलिखित – हाथ के द्वारा लिखित
रत्न जड़ित – रत्नों से जुड़ित
ईश्वर प्रदत्त – ईश्वर से प्रदत्त
मेघाच्छन्न – मेघा से आछन्न (घिरा हुआ)
गुणयुक्त – गुणों से युक्त
रेलयात्रा – रेल के द्वारा यात्रा
रेखांकित – रेखा से अंकित
वाघयुद्ध – वाणी से युद्ध
देवविरचित – देवों के द्वारा विरचित

भड़भूंजा – भाड़ के द्वारा भूनने वाला
रसभरी – रस से भरी हुई
कष्टापन्न – कष्टों से पीड़ित
शोकाकुल – शोक से अकुल
श्रमसाध्य – श्रम से साध्य
आंखोंदेखी – आंखों के द्वारा देखी हुई
धर्मांध – धर्म से अंधा

संप्रदान तत्पुरुष समास – इस समास में दोनों पदों के बीच ‘के लिए’ विभक्ति का लोप रहता है।

उदाहरण–  रसोईघर – रसोई के लिए घर
हवन सामग्री – हवन के लिए सामग्री
रणभूमि – रण के लिए भूमि
गुरु दक्षिणा – ग्रुप के लिए दक्षिणा
सचिवालय – सचिवों के लिए आल
प्रयोगशाला – प्रयोग के लिए शाला
सत्याग्रह – सत्य के लिए आग्रह
लोकसभा – लोक के लिए सभा
गुरु दक्षिणा – ग्रुप के लिए दक्षिण
सभाभवन – सभा के लिए भवन

पुस्तकालय – पुस्तक के लिए आलय
आवेदनपत्र – आवेदन के लिए पत्र
सभामंडप – सभा के लिए मंडप
देशभक्ति – देश के लिए भक्ति
महंगाई भत्ता – महंगाई के लिए भत्ता
रणवास – रानियों के लिए वास
यज्ञशाला – यज्ञ के लिए शाला
बलिदेवी – बलियों के लिए देवी
परीक्षा – भवन परीक्षा के लिए भवन
घरखर्च – घर के लिए खर्च

अपादान तत्पुरुष समास – इस समाज में दोनों पदों के बीच ‘से’ (अलग होना) विभक्ति का लोप रहता है।

उदाहरण – ऋणमुक्त – ऋण से मुक्त
जातिभ्रष्ट – जाति से भ्रष्ट
पदभ्रष्ट – पद से भ्रष्ट
धर्मविमुख – धर्म से अलग होना
देश निकाला – देश से अलग करना
जन्म रोगी – जन्म से रोगी
नेत्रहीन – नेत्रों से हीन
विवाहेतर – विवाह से इतर (भिन्न)
स्वर्ण पतित – स्वर्ण से पतित (गिरा हुआ)
रस हीन – रस से हीन
मायारिक्त – माया से रिक्त
व्ययमुक्त –  व्यय से मुक्त
कामचोर – काम से जी चुराने वाला
सेवामुक्त – सेवा से मुक्त
पापमुक्त – पाप से मुक्त
जन्मांध – जन्म से अंधा

सम्बंध तत्पुरुष समास – इस समास में दोनों पदों के बीच का, के, की विभक्ति का लोप रहता है।

उदाहरण – रामचरित्र – राम का चरित्र
नगरसेठ – नगर का सेट
आमचूर्ण – आम का चूर्ण
राजकुमारी – राज की कुमारी
आमरस – आम का रस
भारतरत्न – भारत का रत्न
घुड़दौड़ – घोड़ों की दौड़
राजमाता – राज की माता
चरित्र चित्रण – चरित्र का चित्रण
ऋषिकन्या – ऋषि की कन्या

वनमाली – वन का माली
मंत्रीपरिषद – मंत्रियों की परिषद
जगन्नाथ – जगत का नाथ
कन्यादान – कन्या का दान
राज्यसभा – राज्य की सभा
नरबली – नर की बलि
वाग्यदान – वाक् का दान
सूतपुत्र – सूत का पुत्र
सभापति – सभा का पति
दुःख सागर – दुखों का सागर
स्वर्ण घर – स्वर्ण का घर

नोट संबंध तत्पुरुष समास की विभक्ति क लिंग, वचन द्वितीय शब्द के अनुसार परिवर्तन होता है।

अधिकरण तत्पुरुष समास – इस समास में दोनों पदों के बीच मे, पे और पर भक्तों का लोप रहता है।

उदाहरण – जीवदया – जीवो पर दया
घुड़सवार – घोड़े पर सवार
डिब्बाबंद – डिब्बे में बंद
ध्यानमग्न – ध्यान में मगन
वनवास – वन में वास
कवि पुंगव – कवियों में श्रेष्ठ
प्रेम मगन – प्रेम में मगन
गृह प्रवेश – ग्रह में प्रवेश
कार्य कुशल – कार्य में कुशल
जगबीती – जग पर बीती हुई

नराधम – नरों में धम
सिरदर्द – सिर में दर्द
आपबीती – अपने पर बीती हुई
नरोत्तम – नरो में उत्तम
शिलालेख – शिला पर लेख
रेलगाड़ी – रेल पर चलने वाली गाड़ी
दही बड़ा – दही में डूबा हुआ बड़ा
कूप मंडूक – कूप में मंडूक
कर्माधीन – कर्म के अधिन

क.  नञ् तत्पुरुष समास – इस समास में पूर्व पद संस्कृत का ‘अ’, ‘अन्’ तथा उर्दू का ‘ना’ उपसर्ग होते हैं जो नकारात्मक अर्थ प्रकट करते हैं।

उदाहरण –  • अनपढ़      • अनजान।   • अकार्य

  • नापाक  • अव्यय       • नालायक   • अनाचार
  • अधर्म   • अकाल       •  अज्ञान     • नापसंद           • अनश्वर    • असभ्य  • अगोचर    • अनबन
  • अनाथ

. अलुक् तत्पुरुष समास – जिसमें प्रथम पद के साथ संयुक्त कारक चिन्ह किसी ना किसी रूप में विद्यमान रहता है उसे अलुक् तत्पुरुष समास कहते हैं।

उदाहरण – धनंजय  – धन को जय करने वाला
मानसिज – मन से जमने वाला
थानेदार – थाने का दार
प्रियवंदा – प्रिय बोलने वाली
मृत्युंजय – मृत्यु को जीतने वाला

लुप्त पद (मध्यम पद लोपी) तत्पुरुष समास – जिस समास में दोनों पदों का सम्बंध बताने वाले पद लुप्त हो उसे लुप्त पद तत्पुरुष समास कहते हैं।

उदाहरण – दही बड़ा – दही में डूबा हुआ बड़ा
बैलगाड़ी – बैल से चलने वाली गाड़ी
रसगुल्ला – रस में डूबा हुआ गुल्ला
वनमानुष – वन में रहने वाला मानुष
तिल पापड़ी – तिल से बनी हुई पापड़ी
शिक्षक – शिक्षा देने का कार्य करने वाला

उपपद तत्पुरुष समास – जिस समास का उत्तर पद ऐसा कृदंत होता है जो स्वतंत्र नहीं होता और प्रत्येक की तरह प्रयुक्त होकर समस्त पद के निर्माण में सहायक बनता है उसे उपपद तत्पुरुष समास कहते हैं।

उदाहरण – दही बड़ा – दही में डूबा हुआ बड़ा
चर्मकार – चमड़े का काम करने वाला
स्वर्ग – स्वयं गमन करने वाला
तटस्थ – तट पर स्थित रहने वाला
स्वर्णकार – सोने का काम करने वाला

100+ समास के उदाहरण | samas ke udaharan

दही बड़ा – दही में डूबा हुआ बड़ा
बैलगाड़ी – बैल से चलने वाली गाड़ी
रसगुल्ला – रस में डूबा हुआ गुल्ला
शिक्षक – शिक्षा देने का कार्य करने वाला
मृत्युंजय – मृत्यु को जीतने वाला
घुड़सवार – घोड़े पर सवार
डिब्बाबंद – डिब्बे में बंद
गृह प्रवेश – ग्रह में प्रवेश
नराधम – नरों में धम
सिरदर्द – सिर में दर्द
आपबीती – अपने पर बीती हुई
रेलगाड़ी – रेल पर चलने वाली गाड़ी
भारतरत्न – भारत का रत्न
रामचरित्र – राम का चरित्र
घुड़दौड़ – घोड़ों की दौड़
राजमाता – राज की माता

चरित्र चित्रण – चरित्र का चित्रण
ऋषिकन्या – ऋषि की कन्या
वनमाली – वन का माली
कन्यादान – कन्या का दान
राज्यसभा – राज्य की सभा
नरबली – नर की बलि
वाग्यदान – वाक् का दान
देश निकाला – देश से अलग करना
जन्म रोगी – जन्म से रोगी
नेत्रहीन – नेत्रों से हीन
विवाहेतर – विवाह से इतर (भिन्न)
कामचोर – काम से जी चुराने वाला
सेवामुक्त – सेवा से मुक्त
रसोईघर – रसोई के लिए घर
हवन सामग्री – हवन के लिए सामग्री

रणभूमि – रण के लिए भूमि
गुरु दक्षिणा – ग्रुप के लिए दक्षिणा
प्रयोगशाला – प्रयोग के लिए शाला
सत्याग्रह – सत्य के लिए आग्रह
अंशुमाली :- अंशुओं के माला पहनता है जो (सूर्य)
प्रधानमंत्री :- मंत्रियों में प्रधान है जो (शासनाध्यक्ष)
चंद्रमुखी :- चंद्र है मोली पर जिसके (शिव)
पंचानन :- पांच है आनंद जिसके शिव
लंबोदर :- लंबा है जिसका गणेश
त्रिलोकी :- तीन लोक का स्वामी है जो
माता-पिता :- माता और पिता
धर्मा-धर्म :- धर्म और अधर्म
दाल-रोटी :- दाल और रोटी

सपरिवार – परिवार के साथ
प्रत्युपकार – बदले के उपकार
प्रतिपल – प्रत्येक पल
यथावसर – अवसर के अनुसार
प्रतिक्षण – हर क्षण
यथाशक्ति – शक्ति के अनुसार
यथास्थान – जो स्थान निश्चित है
चर्मकार – चमड़े का काम करने वाला
स्वर्ग – स्वयं गमन करने वाला
तटस्थ – तट पर स्थित रहने वाला
स्वर्णकार – सोने का काम करने वाला
दही बड़ा – दही में डूबा हुआ बड़ा
वनमानुष – वन में रहने वाला मानुष
तिल पापड़ी – तिल से बनी हुई पापड़ी

सुना-सुनी :- सुनने के बाद सुनना
घड़ी-घड़ी :- हर घड़ी
एका-एक :- एक के बाद एक
धनंजय – धन को जय करने वाला
मानसिज – मन से जमने वाला
थानेदार – थाने का दार
प्रियवंदा – प्रिय बोलने वाली
जीवदया – जीवो पर दया
ध्यानमग्न – ध्यान में मगन
वनवास – वन में वास
कवि पुंगव – कवियों में श्रेष्ठ
प्रेम मगन – प्रेम में मगन
कार्य कुशल – कार्य में कुशल
जगबीती – जग पर बीती हुई
नरोत्तम – नरो में उत्तम
शिलालेख – शिला पर लेख

दही बड़ा – दही में डूबा हुआ बड़ा
कूप मंडूक – कूप में मंडूक
कर्माधीन – कर्म के अधिन
नगरसेठ – नगर का सेट
आमचूर्ण – आम का चूर्ण
राजकुमारी – राज की कुमारी
आमरस – आम का रस
मंत्रीपरिषद – मंत्रियों की परिषद
जगन्नाथ – जगत का नाथ
सूतपुत्र – सूत का पुत्र
सभापति – सभा का पति
दुःख सागर – दुखों का सागर
स्वर्ण घर – स्वर्ण का घर
ऋणमुक्त – ऋण से मुक्त
जातिभ्रष्ट – जाति से भ्रष्ट
पदभ्रष्ट – पद से भ्रष्ट
धर्मविमुख – धर्म से अलग होना

स्वर्ण पतित – स्वर्ण से पतित (गिरा हुआ)
रस हीन – रस से हीन
मायारिक्त – माया से रिक्त
व्ययमुक्त – व्यय से मुक्त
पापमुक्त – पाप से मुक्त
जन्मांध – जन्म से अंधा
सचिवालय – सचिवों के लिए आलय
लोकसभा – लोक के लिए सभा
गुरु दक्षिणा – ग्रुप के लिए दक्षिण
सभाभवन – सभा के लिए भवन
पुस्तकालय – पुस्तक के लिए आलय
आवेदनपत्र – आवेदन के लिए पत्र
सभामंडप – सभा के लिए मंडप
देशभक्ति – देश के लिए भक्ति
महंगाई भत्ता – महंगाई के लिए भत्ता

रणवास – रानियों के लिए वास
यज्ञशाला – यज्ञ के लिए शाला
बलिदेवी – बलियों के लिए देवी
परीक्षा – भवन परीक्षा के लिए भवन
घरखर्च – घर के लिए खर्च
जीवदया – जीवो पर दया
घुड़सवार – घोड़े पर सवार
डिब्बाबंद – डिब्बे में बंद
ध्यानमग्न – ध्यान में मगन
वनवास – वन में वास
कवि पुंगव – कवियों में श्रेष्ठ
प्रेम मगन – प्रेम में मगन
गृह प्रवेश – ग्रह में प्रवेश
कार्य कुशल – कार्य में कुशल
जगबीती – जग पर बीती हुई

नराधम – नरों में धम
सिरदर्द – सिर में दर्द
आपबीती – अपने पर बीती हुई
नरोत्तम – नरो में उत्तम
शिलालेख – शिला पर लेख
रेलगाड़ी – रेल पर चलने वाली गाड़ी
दही बड़ा – दही में डूबा हुआ बड़ा
कूप मंडूक – कूप में मंडूक
कर्माधीन – कर्म के अधिन
रामचरित्र – राम का चरित्र
नगरसेठ – नगर का सेट
आमचूर्ण – आम का चूर्ण
राजकुमारी – राज की कुमारी
आमरस – आम का रस
भारतरत्न – भारत का रत्न

घुड़दौड़ – घोड़ों की दौड़
राजमाता – राज की माता
चरित्र चित्रण – चरित्र का चित्रण
ऋषिकन्या – ऋषि की कन्या
वनमाली – वन का माली
मंत्रीपरिषद – मंत्रियों की परिषद
जगन्नाथ – जगत का नाथ
कन्यादान – कन्या का दान
राज्यसभा – राज्य की सभा
नरबली – नर की बलि
वाग्यदान – वाक् का दान
सूतपुत्र – सूत का पुत्र
सभापति – सभा का पति
दुःख सागर – दुखों का सागर
स्वर्ण घर – स्वर्ण का घर

वन गमन :- वन को गमन करने वाला
चिडिमार – चिड़ी को मारने वाला
कमरतोड़ :- कमर को तोड़ने वाला।
दिल तोड़ :- दिल को तोड़ने वाला।
प्राप्तोदक :- उदक को प्राप्त।
आग्नि भक्षी :- अग्नि को भक्षित करने वाला
मनोहर :- मन को हरने वाला।
चितचोर :- चित को चुराने वाला।
स्वर्ग :- प्राप्त स्वर्ग को प्राप्त करने वाला।
विदेश :- गमन विदेश को गमन।
नरभक्षी :- नरो को भक्षित करने वाला।
यश प्राप्त :- यश को प्राप्त।
ग्रहगत :- घर को आया हुआ।
कृष्णाश्रित :- कृष्ण को आश्रित।

त्रिनेत्र :- तीन है नेत्र जिसके (शिव)
मुरारि :- मुर का अरि है जो वह (कृष्णा)
गिरिधर :- गिरी को धारण करने वाला (कृष्णा)
दशानन :- दस है आनंद जिसके (रावण)
गजानन :- गज का आनंद है जिसका (गणेश)
दिगंबर :- दिशाएं ही है जिसका अंबर ऐसा वह
घनश्याम :- घन जैसा श्याम है जो वह (कृष्णा)
पितांबर :- पीत अम्बर है जिसके वह (विष्णु)
पंजाब :- पांच आबों वाला क्षेत्र एक राज्य
बारहसिंघा :- बारह है सींग जिसके (हिरण की प्रजाति)
युधिष्ठिर :- युद्ध में स्थित रहता है जो (धर्मराज)
धनंजय :- धन को जय करता है जो (अर्जुन)
सुग्रीव :- सुंदर है ग्रीवा जिसकी मानव राज
मुरारी सुंदर :- है जो रि है जो श्याम श्री कृष्ण

शाखामृग :- जो पेड़ की शाखाओं पर चलता है
मृत्युंजय :- जिसने मृत्यु को जीत लिया है जो
हंस वाहिनी :- हंस जिसका है वाहन
चंद्र-बदन :- चंद के समान वदन
कमलनयन :- कमल के समान नयन
लौहपुरुष :- लोहे के समान पुरुष
अरविंदलोचन :- अरविंद के समान लोचन
विद्याधन :- विद्या रूपी धन
मीनाक्षी :- मछली के समान आंखों वाली
कनकलता :- कनक के समान लता
मुखारविंद :- मुख के समान अरविंद
मुख-चंद्र :- मुख रूपी चंद्रमा
भवसागर :- भव रूपी सागर
क्रोधाग्नि :- क्रोध रूपी अग्नि
चरण कमल :- चरण रूपी कमल

देहलता :- लता रुपी देह
करकमल :- कमल रूपी कर
कीर्तिकला :- लता रूपी की कीर्ति
नीला आकाश :- नीला है जो आकाश
नीलगाय :- नीली है जो गाय
महात्मा :- महान है जो आत्मा
महाऋषि :- महान है जो ऋषि
मंदबुद्धि :- मंद है जो बुद्धि
घनश्याम :- घन जैसा श्याम
पितांबर :- पीत है जो अंबर
भक्तांबर :- रक्त के रंग का है जो अंबर
निलोत्पल :- नीला है जो उत्पल
परमाणु :- परम है जो आणु
महाराजा :- महान है जो राजा

महादेवी :- महान है जो देवी
महाभोज :- महान है जो भोज
श्वेतांबर :- श्वेत है जो अंबर
महाकाव्य :- महान है जो काव्य
प्रियजन :- प्रिय है जो जन
सूपुरुष :- अच्छा है जो पुरुष
नीलरत्न :- नीला है जो रत्न
नीलकमल :- नीला है जो कमल
उच्च शिखर :- ऊंचा है जो शिखर
महाजन :- महान है जो जन
काली मिर्च :- काली है जो मिर्च
नवरात्र – नौं यात्रियों का समाहार
सप्ताह – सात दिनों का समाहार
सप्तऋषि – सात राशियों का समूह

शताब्दी – सौ वर्षों का समूह
शतक – सौ का समाहार
पंचवटी – पांच वटों का समाहार।
चौमासा – चार मासों का समाहार
त्रिरत्न – तीन रत्नों का समाहार।
अठन्नी – आठ आनो का समूह
द्विगु – दो गायों का समूह।
त्रिवेणी – तीन वेणियों का समाहार।
दुपहिया – दो पहियों वाला
त्रिमूर्ति – तीन मूर्तियों का समूह।
तिकोना – तीन कोनों वाला
पंचपात्र – पांच पात्रों का समूह।
चौराहा – चार राहों का समूह।
दोपहर – दो पहरों का समूह।
सतसई – सात सौ दोहों का समूह।
तिरंगा – तीन रंगों का समूह।
त्रिभुवन – तीन भवनों का समूह।
चतुर्भुज – चार भुजाओं का समूह

दो – चार :- दो से चार तक
दस – बीस। :- दस से बीस तक
सौ – दो सौ :- सौ से दो सौ तक
लाख – दो लाख :- लाख से दो लाख तक
सुख-दुःख :- सुख या दुख
भला-बुरा :- भला या बुरा,
पाप-पुण्य :- पाप या पुण्य
सत्यासत्य :- सत्य या असत्य
राग-विराग :- राग या विराग
आज-कल :- आज या कल
सुख-दुख :- सुख या दुख
लाल-पाल-बाल :- लाल,पाल और बाल
रोटी-कपड़ा-मकान :- रोटी,कपड़ा और मकान
तन-मन-धन :- तन,मन और धन
हाथी-घोड़ा-पालकी :- हाथी,घोड़ा और पालकी

अन्न-जल :- अन्न और जल
शीतोष्ण :- शीत या उष्ण
भला-बुरा :- भला और बुरा
दूध-रोटी :- दूध और रोटी
लाभ-हानि :- लाभ और हानि
स्त्री-पुरुष :- स्त्री और पुरुष
भाई-बहन :- भाई और बहन
गौरी-शंकर :- गौरी और शंकर
जल-वायु :- जल और वायु
हरि-हर :- हरि और हर
पान-तमाखू :- पान और तमाखू
हाथी-घोड़ा :- हाथी और घोड़ा
कपड़े-लत्ते :- कपड़े और लत्ते
सीता-राम :- सीता और राम
राजा-प्रजा :- राजा और प्रजा

खरा-खोटा :- खरा और खोटा
नर-नारी :- नर और नारी
फल-फूल :- फल और फूल रुपया-पैसा :- रुपया और पैसा
दाल-भात :- दाल और भात
शुभा-शुभ :- शुभ और अशुभ
पैंतालीस – चालीस और पांच
तिरानवें – नब्बे और तीन
पच्चीस – बीस और पांच
छियासी – अस्सी और छह
पेट-भर :- पेट भर कर
आमरण – मरने तक
बकायदा – कायदे के अनुसार
लाजवाब – बिना जवाब के
निरोग – रोग रहित

नासमझ – बिना समझ के
बेईमान – बिना ईमान के
बेचैन – बिना चैन के
सार्थक – अर्थ सहित
निडर – बिना डर के
निधड़क – बिना धड़क के
निर्विकार -बिना विकार के
साफ-साफ :- साफ के बाद साफ
घर-घर :- प्रत्येक घर
हाथों-हाथ :- एक हाथ से दूसरे हाथ तक
बीचो-बीच :- ठीक बीच में
कानो-कान :- कान ही कान में
धड़ा-धड़ :- धड़ के बाद पुनः धड़
रातो-रात :- रात ही रात में
एक-एक :- एक के बाद एक
भागम-भाग :- भागने के बाद भागना

यथाक्रम – क्रम के अनुसार
यथाशीघ्र – जितना शीघ्र हो
प्रतिदिन – दिन दिन या प्रत्येक दिन
प्रतिक्षण – प्रत्येक क्षण
यथा विधि – विधि के अनुसार
यथेच्छा – इच्छा के अनुसार
प्रत्यक्ष – अक्षि के आगे
प्रत्येक – हर एक दिन
यथामति – जैसी मति है
यथार्थ – जैसा अर्थ है वैसा
यथोचित – जैसा उचित है
प्रतिध्वनी – ध्वनि के बाद ध्वनि
प्रतिशत – प्रत्येक सत या सैंकड़ा
प्रतिहिंसा – हिंसा के बदले हिंसा
प्रतिद्वंद – द्वन्द के बदले द्वन्द

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